Wednesday, 10 May 2017

शबनम...!!!

शब्दों ने सजाईथी  ये ग़ज़ल
उसके अब सिर्फ शेर रह गए

जाते जाते कुछ न बोली वो
कभी न बिछड़ने के वादे
अब सिर्फ यादो में रह गए

रोज छोड़ आता था दो बून्द आसु
उसके आँगन में लगे पारिजात पे
हर सुबह उठ कर देखती थी वो
उस पारिजात का वो बहार

सुबह की  वो ओस की बुँदे
लाते थे बहार उन  फ़ूलोंमे
मिलती थी ठंडक उस मन को
जिसको हम चाहते है  

एक बार सिर्फ एक बार कभी
बाहर आकर उन फ़ूलोंको
वो नज़दीक से देखती तब
तब पता चलता उसको
वो आसुओ की बुँदे थी

हमेशा खुश रखना चाहता था उसको
आज तक कभी आंच ना आने दी
जाते जाते इतनाही सही
मेरे आसुओ ने उसको ख़ुशी दी
मेरे आसुओ ने उसको ख़ुशी दी

                                -  वरद




  

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