Monday, 11 September 2017

ये सफ़र...!!!

कही दिशाओं से निकल रहे थे ये रास्ते
कही दिशाओं तक साथ जाना था
निकल गई थी सब मंझीले बहोत दुर तक
हमे तो बस उनके पास जाना था

मिले थे बहोतसे लोग ये सफ़र में
सफ़र साथ करने का वादा रहा था
रेगिस्तान में दिखें घने बादलों जैसा
ये वादा एक बावंडर रहा था

सबको निकलना था अपने अपने रास्ते
किस्मत ने भी साथ छोड रखा था
कभी पिछे मुडकर देखने ना आए
उन्ही रास्तों पर हमको दफना दिया था

खत्म हो गया था सफर वही
आंखें अब खुल नहीं पाती
अंधे हो गए हैं हम
मंझीले अब नजर नही आती

                        -  वरद 

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